The Lockdown Poem by Ayushmann Khurrana

The lockdown period that we are living today due to coronavirus has brought out the creative side of many people. And if you are already a creative person then this time will only enhance your talent. Ayushmann Khurrana comes in this list.

He is expressing the present situation and the tough times that are yet to come. We can only pray that they don’t, but they will. Ayushmann writes about the present situation and highlights the fact it is really frustrating to stay indoors 24 hours.

Here it is…

“Everyday, you cannot be really positive. Reality just strikes you hard and you think about whats happening in this world. Toh humesha sakaratmak banaye rakhna apne aapko aasan nahi hota. Kavita Maine likhi thi, Ardhnirmit two main wog padhna chahoonga aaj.”

यहाँ कोई मित्र नहीं है, कोई आश्वस्त चरित्र नहीं है,
सब अर्धनिर्मित है|
अर्धनिर्मित इमारतें हैं, अर्धनिर्मित बच्चों कि शरारतें हैं,
अर्धनिर्मित ज़िन्दगी कि शर्ते हैं,
अर्धनिर्मित जीवन पाने के लिए लोग रोज़ यहाँ मरते हैं|
अर्धनिर्मित है यहाँ के प्रेमियों का प्यार,
अर्धनिर्मित है यहाँ मनुष्यों के जीवन के आधार|
आज का दिन अर्धनिर्मित है,
न धूप है, न छाओं है,
मंजिल कि डगर से विपरीत चलते पाँव है| |
अर्धनिर्मित सी सेहत है,
न कभी देखा निरोगी काया को, न कभी दिल से कहा अलविदा माया को,
हमारी अर्धनिर्मित सी कहानी है, अर्धनिर्मित हमारे युवाओं कि जवानी है|
हम रोज़ एक अर्धनिर्मित शय्या पर लेटे हुए एक अर्धनिर्मित सा सपना देखते हैं,
उस सपने में हम अपनी अर्धनिर्मित आकांक्षाओं को आसमानों में फेंकते हैं|
आसमान को भी इन आकांक्षाओं को समेटकर अर्धनिर्मित होने का एहसास
होता होगा,
क्योंकि यह आकांक्षाएं हमारी नहीं आसमान की है,
बिलकुल वैसे ही जैसे यह अर्धनिर्मित गाथा तुम्हारी है और आयुष्मान की है|
-आयुष्मान

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यहाँ कोई मित्र नहीं है, कोई आश्वस्त चरित्र नहीं है, सब अर्धनिर्मित है| अर्धनिर्मित इमारतें हैं, अर्धनिर्मित बच्चों कि शरारतें हैं, अर्धनिर्मित ज़िन्दगी कि शर्ते हैं, अर्धनिर्मित जीवन पाने के लिए लोग रोज़ यहाँ मरते हैं| अर्धनिर्मित है यहाँ के प्रेमियों का प्यार, अर्धनिर्मित है यहाँ मनुष्यों के जीवन के आधार| आज का दिन अर्धनिर्मित है, न धूप है, न छाओं है, मंजिल कि डगर से विपरीत चलते पाँव है| | अर्धनिर्मित सी सेहत है, न कभी देखा निरोगी काया को, न कभी दिल से कहा अलविदा माया को, हमारी अर्धनिर्मित सी कहानी है, अर्धनिर्मित हमारे युवाओं कि जवानी है| हम रोज़ एक अर्धनिर्मित शय्या पर लेटे हुए एक अर्धनिर्मित सा सपना देखते हैं, उस सपने में हम अपनी अर्धनिर्मित आकांक्षाओं को आसमानों में फेंकते हैं| आसमान को भी इन आकांक्षाओं को समेटकर अर्धनिर्मित होने का एहसास होता होगा, क्योंकि यह आकांक्षाएं हमारी नहीं आसमान की है, बिलकुल वैसे ही जैसे यह अर्धनिर्मित गाथा तुम्हारी है और आयुष्मान की है| -आयुष्मान

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